आज है बुद्ध पूर्णिमा, जानिए पूजा विधि और शुभ मुहूर्त
हिन्दू धर्म में पूर्णिमा तिथि को बहुत महत्त्व दिया गया है। जिसमें बुध पूर्णिमा को वैशाख माह में मनाया जाता है। आज यानी 7 मई को बुद्ध पूर्णिमा है। दरअसल वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा भी कहा जाता है। वैशाख पूर्णिमा के दिन ही महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था, इसी दिन उन्हें ज्ञान (बुद्धत्व) की प्राप्ति हुई थी और इसी दिन उन्हें निर्वाण हुआ था।
इसलिए बुद्ध पूर्णिमा या बुद्ध जयंती बौद्धों का सबसे बड़ा त्यौहार है। पुरे विश्व में बौद्ध अनुयायी इस दिन को बड़े ही उल्लास से बनाते हैं। हिन्दू धर्म में बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवा अवतार माना जाता है। अतः हिन्दुओं के लिए भी यह दिन पवित्र माना जाता है। वैशाख पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति को पाप कर्मों से छुटकारा मिलता है। शुभ मुहूर्त में पूजन करने से बिगड़े काम बन जाते हैं।
बुद्ध पूर्णिमा का महत्व केवल भारत में नहीं है, बल्कि इसे दुनिया के दूसरे देशों में भी मनाया जाता है। जिनमें श्रीलंका, कंबोडिया, वियतनाम, चीन, नेपाल थाईलैंड, मलयेशिया, म्यांमार, इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हैं। श्रीलंका में इस दिन को ‘वेसाक’ के नाम से जाना जाता है, जो निश्चित रूप से वैशाख का ही अपभ्रंश है।
शुभ मूहूर्त
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 6 मई 2020 को शाम 7.44 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त: 7 मई 2019 को शाम 4.14
गौतम बुद्ध का जन्म
भगवान बुद्ध का जन्म 563 ई.पू. में कपिलवस्तु के पास लुम्बिनी नामक स्थान पे हुआ था। बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। उनके पिता का नाम शुद्धोधन एवं माताजी के नाम मायादेवी था। उनकी माता उनको सात दिन का ही छोड़कर मर गई थीं और उनका लालन-पालन सेवक और दासियों द्वारा किया गया था।
इनके जन्म के समय किसी ज्योतिषी ने कह दिया था कि- ये आगे चलकर यदि घर में रहे तो एक पराक्रमी सम्राट बनेंगे और जो गृह त्यागी हो गए तोबडे़ धर्म प्रचारक और लोकसेवी सिद्ध होंगे। इस भविष्य कथन से राजा शुद्धोदन का हृदय शंकाकुल हो गया था और उन्होंने यह व्यवस्था कर रखी थी कि राजकुमार को सदैव अत्यंत सुख और प्रसन्नता के वातावरण में रखा जाए और उनके सामने सांसारिक दु:ख, रोग- शोक की चर्चा भूलकर भी न की जाए।
यही कारण था कि राजभवन के दास-दासी उनको सदैव आमोद- प्रमोद और मनोरंजन में लगाए रहते थे और संसार की वास्तविक अवस्था के संपर्क मे उनको कभी नहीं आने दिया जाता था। 16 वर्ष की उम्र में सिद्धार्थ का विवाह राजकुमारी यशोधरा से कर दिया गया जिनसे इनका एक पुत्र राहुल पैदा हुआ।
पर होनी को कौन टाल सकता है। एक दिन जब वह भ्रमण पर निकले तो उन्होंने एक वृद्ध को देखा जिसकी कमर झुकी हुई थी और वह लगातार खांसता हुआ लाठी के सहारे चला जा रहा था। थोड़ी आगे एक मरीज को कष्ट से कराहते देख उनका मन बेचैन हो उठा। उसके बाद उन्होंने एक मृतक की अर्थी देखी, जिसके पीछे उसके परिजन विलाप करते जा रहे थे।
ये सभी दृश्य देख उनका मन क्षोभ और वितृष्णा से भर उठा, तभी उन्होंने एक संन्यासी को देखा जो संसार के सभी बंधनों से मुक्त भ्रमण कर रहा था। इन सभी दृश्यों ने सिद्धार्थ को झकझोर कर रख दिया और उन्होंने संन्यासी बनने का निश्चय कर लिया। तब 19 वर्ष की आयु में एक रात सिद्धार्थ गृह त्याग कर इस क्षणिक संसार से विदा लेकर सत्य की खोज में निकल पड़े।
बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति
गृहत्याग के बाद उन्होंने सात दिन ‘अनुपीय’ नामक ग्राम में बिताए। फिर गुरु की खोज में वह मगध की राजधानी पहुंचे जहां कुछ दिनों तक वह ‘आलार कालाम’ नामक तपस्वी के पास रहे। इसके बाद वह एक आचार्य के साथ भी रहे लेकिन उन्हें कहीं संतोष नहीं मिला। अंत में ज्ञान की प्राप्ति के लिए उन्होंने स्वयं ही तपस्या शुरू कर दी। कठोर तप के कारण उनकी काया जर्जर हो गई थी लेकिन उन्हें अभी तक ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई थी।
घूमते-घूमते वह एक दिन गया में उरुवेला के निकट निरंजना (फल्गु) नदी के तट पर पहुंचे और वहां एक पीपल के वृक्ष के नीचे स्थिर भाव में बैठ कर समाधिस्थ हो गए। वहां बुद्ध छ: वर्षों तक समाधिस्थ रहने के बाद वैशाख पूर्णिमा के दिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वह महात्मा गौतम बुद्ध कहलाए। उस स्थान को ‘बोध गया’ व पीपल का पेड़ बोधि वृक्ष कहा जाता है। इन छ: वर्षों के समय को इसे बौद्ध साहित्य में ‘संबोधि काल’ कहा गया है।
महात्मा बुद्ध का निर्वाण
महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया था एवं उन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना की। 483 ई.पू. में कुशीनगर में बैशाख पूणिर्मा के दिन अमृत आत्मा मानव शरीर को छोङ ब्रहमाण्ड में लीन हो गई। इस घटना को ‘महापरिनिर्वाण’ कहा जाता है।
बुद्ध पूर्णिमा से जुड़ी मान्यताएं
माना जाता है कि वैशाख की पूर्णिमा को ही भगवान विष्णु ने अपने नौवें अवतार के रूप में जन्म लिया।
मान्यता है कि भगवान कृष्ण के बचपन के दोस्त सुदामा वैशाख पूर्णिमा के दिन ही उनसे मिलने पहुंचे थे। इसी दौरान जब दोनों दोस्त साथ बैठे तब कृष्ण ने सुदामा को सत्यविनायक व्रत का विधान बताया था। सुदामा ने इस व्रत को विधिवत किया और उनकी गरीबी नष्ट हो गई। इस दिन धर्मराज की पूजा करने की भी मान्यता है। कहते हैं कि सत्यविनायक व्रत से धर्मराज खुश होते हैं। माना जाता है कि धर्मराज मृत्यु के देवता हैं इसलिए उनके प्रसन्न होने से अकाल मौत का डर कम हो जाता है।
बुद्ध पूर्णिमा के दिन क्या करें
सूरज उगने से पहले उठकर घर की साफ-सफाई करें।
गंगा में स्नान करें या फिर सादे पानी से नहाकर गंगाजल का छिड़काव करें।
घर के मंदिर में विष्णु जी की दीपक जलाकर पूजा करें और घर को फूलों से सजाएं।
घर के मुख्य द्वार पर हल्दी, रोली या कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं और गंगाजल छिड़कें।
बोधिवृक्ष के आस-पास दीपक जलाएं और उसकी जड़ों में दूध विसर्जित कर फूल चढ़ाएं।
गरीबों को भोजन और कपड़े दान करें।
अगर आपके घर में कोई पक्षी हो तो आज के दिन उन्हें आज़ाद करें।
रोशनी ढलने के बाद उगते चंद्रमा को जल अर्पित करें।
