Oct 29 2026 / 12:11 AM

विश्व प्रसिद्ध धरोहर की अपेक्षा होने से यह स्थान अपना मुकाम नहीं बन पाया

सुनील योगी बागली- बागली मुख्यालय से 60 किलोमीटर दूर पोटला ग्राम पंचायत अंतर्गत विश्व धरोहर के रूप में विशेष पर्वतीय वन परिक्षेत्र उपस्थित है। यह पर्वत लगभग तीन किलोमीटर में 7 हिस्सों में बटा हुआ है, स्थानीय लोग इसे कावड़िया पर्वत कहते हैं। इस पर्वत पर कई भूगर्भ वैज्ञानिक जाकर अपना अपना मत दे चुके हैं लेकिन पुरातत्व विभाग इस महत्व नहीं दे रहा है।

मिश्रित धातु युक्त पत्थर
पत्थरों की विशेष श्रृंखला यहां पर उपस्थित है इनकी लंबाई चौड़ाई अन्य पत्थरों से भिन्न है और अलग-अलग आकार त्रिकोण, चतुर कौण, षटकोंण, पंचकोंण, आकार में यह पत्थर 10 फीट से 15 फीट तक लंबे है। इन्हें पत्थरों से पीटने पर अलग-अलग प्रकार की आवाज़ ध्वनि तरंग आती है। 1992 में बागली कॉलेज में पदस्थ भूगोल के प्रोफेसर अजय श्रीवास्तव यहां आए तो उन्होंने बताया कि यह पत्थर मिश्रित धातु से निर्मित है। उसके बाद कई भूगर्भ शास्त्री यहां पर अवलोकन कर चुके हैं कुछ वैज्ञानिकों ने इस स्थान पर डोलोमाइट होने की बात भी बताई ।

विश्व में नार्वे में भी ऐसा ही पर्वत है
भूगोल वैज्ञानिक बताते हैं कि नार्वे में इस प्रकार का पर्वत पाया गया है जहां पर उक्त पर्वत को राष्ट्र की धरोहर मानकर पर्यटन स्थल घोषित किया है जिससे उस देश की इनकम भी बड़ी है, और पर्यटन क्षेत्र में नाम भी जुड़ा है।

डॉक्टर तेज सिंह सेंधव का शोध
हस्तशिल्प विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर तेज सिंह सेंधव इस स्थान पर कई बार आए और उन्होंने तात्कालिक सरकारों को पत्र लिखकर ध्यान आकर्षण कराया तथा इस स्थान को पुरातत्व विभाग में शामिल करने की बात कही। साथ ही बताया कि यह क्षेत्र विश्व हेरिटेज श्रेणी में शामिल हो सकता है।

वन विभाग का अड़ंगा
यह स्थान वन विभाग क्षेत्र में आता है इसलिए यहां पर सड़क निर्माण और अन्य प्रगति निर्माण नहीं हो पाए पोटला ग्राम पंचायत से 3 किलोमीटर दूर तक बेहद खराब मार्ग होने से पर्यटक आसानी से यहां पर नहीं पहुंच पाते हैं यहां पर ठहरने की और जलपान की उचित व्यवस्था नहीं होने से लोगों का आकर्षण नहीं के बराबर है।

पूर्व डीएफओ प्रेम नारायण मिश्रा ने की थी अनुकरणीय पहल
देवास वन विभाग में फॉरेस्ट ऑफिसर पी एन मिश्रा ने पहल करते हुए अव्यवस्थित पत्थरों को समाहित कर ऊपर तक जाने के लिए सीडी द्वारा बना दिया है,

रोजगार की संभावना
इस स्थान पर पर्यटन विभाग चाहे तो इस क्षेत्र को अजंता एलोरा की तरह संरक्षित कर पर्यटन क्षेत्र में शामिल करते हुए इस स्थान को विकसित कर सकते हैं इसके चलते क्षेत्र के कई बेरोजगार लोगों को रोजगार भी मिलेगा और पर्यटनों की पहुंच में भी यह स्थान शामिल रहेगा।

कर चुके हैं कई बार मांग
बोल बम कावड़ यात्रा के संयोजक गिरधर गुप्ता बताते हैं कि उन्होंने हर सरकार में पत्र लिखकर इस क्षेत्र को पर्यटन क्षेत्र में शामिल करने की मांग संबंधी पत्र लिख चुके हैं लेकिन हर विधायक सिर्फ आश्वासन देता नजर आया किसी ने यह बात केंद्र सरकार तक नहीं पहुंचाई।

विशेषता
यह स्थान पिपरी मुख्यालय से 8 किलोमीटर दूर है और दूर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे यहां पर रखे हुए पत्थर मानव हस्तशिल्प का अनूठा उदाहरण है और इन्हें किसी ने तराशा है किवंदती यह भी है कि यह पत्थर किसी भी स्थिति में अन्य स्थान पर नहीं ले जाया जा सकते रास्ते में टूट जाते हैं वरना मकान बनाने वाले इन पत्थरों का उपयोग बखूबी करते हुए यहां से पर्वत को खाली कर देते । गर्मी में यहां पर पीने के पानी की व्यवस्था नहीं रहती इसलिए यह गर्मी के दिनों में पतझड़ वन सुनसान जैसा दिखाई देता है यदि इसे पुरातत्व विभाग सुरक्षित कर दे तो इस स्थान पर बहुत कुछ विकास हो सकता है।

महंगी धातुओं से इनकार नहीं किया जा सकता
डॉक्टर तेज सिंह सेंधव ने बताया कि भूगर्भ वैज्ञानिक यदि खोज करें तो यहां पर सोना चांदी अयस्क तांबा खुदाई के दौरान तथा इन पत्थरों में शामिल हो सकता है ईमानदारी से यहां पर भूगर्भ अनुसंधान हो तो बड़े खनिज यहां पर आसानी से मिल सकते हैं।

धार्मिक मान्यता
धार्मिक मान्यता अनुसार कुछ लोग इसे महाभारत कालीन मानते हैं और पर्वतों के इस आकार के पत्थरों को भी निर्मित मानते हैं। लेकिन इसके कोई साक्ष्य किसी धार्मिक ग्रंथ में नहीं है ।

Share With

मध्यप्रदेश