Jun 06 2026 / 8:02 AM

जानिए कब है बैसाखी, क्यों मनाया जाता है ये पर्व

बैसाखी पर्व को सिख समुदाय नए साल के रूप में मनाते हैं। वर्ष 2020 में 13 अप्रैल, सोमवार को बैसाखी का पर्व मनाया जा रहा है। बैसाखी बैसाख (वैशाख) माह से बना है। बैसाखी मुख्यत: कृषि पर्व है जिसे दूसरे नाम से ‘खेती का पर्व’ भी कहा जाता है। यह पर्व किसान फसल काटने के बाद नए साल की खुशियां के रूप में मानते हैं।

भारतभर में बैसाखी का पर्व सभी जगह मनाया जाता है। यह एक राष्ट्रीय त्योहार है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार हर साल 13 अप्रैल को बैसाखी पर्व मनाया जाता है जिसे देश के भिन्न-भिन्न भागों में रहने वाले सभी धर्मपंथ के लोग अलग-अलग तरीके से मनाते हैं।

उल्लास और उमंग का यह पर्व बैसाखी अप्रैल माह के 13 तारीख को जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, तब मनाया जाता है। वर्ष 2020 में यह पर्व 13 अप्रैल को यह मनाया जाएगा। यह केवल पंजाब में ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत के अन्य प्रांतों में भी उल्लास के साथ मनाया जाता है।

हिंदू भी इस दिन को काफी महत्वपूर्ण मानते हैं। मान्‍यता है कि हजारों सालों पहले गंगा इसी दिन धरती पर अवतरित हुईं थीं। इसी कारण बैसाखी पर स्नान-दान का विशेष महत्व माना गया है। बैसाखी के दिन लोग नाचते-गाते हैं, पकी फसल काटी जाती है। पंजाब में गुरुद्वारों को सजाया जाता है। भजन-कीर्तन होते हैं। पर इस साल कोरोनावायरस के कारण लॉकडाउन है। इसलिए सरकार बैसाखी पर्व पर लोगों से घरों पर ही रहने की अपील कर रही है।

अत: बैसाखी आकर पंजाब के युवा वर्ग को याद दिलाती है, साथ ही वह याद दिलाती है उस भाईचारे की जहां माता अपने 10 गुरुओं के ऋण को उतारने के लिए अपने पुत्र को गुरु के चरणों में समर्पित करके सिख बनाती थी।

वर्ष 1699 में सिखों के 10वें गुरु, गुरु गोविन्द सिंह ने बैसाखी के दिन ही आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की नींव रखी थी। इसका ‘खालसा’ खालिस शब्द से बना है जिसका अर्थ शुद्ध, पावन या पवित्र होता है। खालसा पंथ की स्थापना के पीछे गुरु गोविन्द सिंह का मुख्य लक्ष्य लोगों को तत्कालीन मुगल शासकों के अत्याचारों से मुक्त कर उनके धार्मिक, नैतिक और व्यावहारिक जीवन को श्रेष्ठ बनाना था।

इस पंथ के द्वारा गुरु गोविन्दसिंह ने लोगों को धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव छोड़कर इसके स्थान पर मानवीय भावनाओं को आपसी संबंधों में महत्व देने की भी दृष्टि दी। इस कृषि पर्व की आध्यात्मिक पर्व के रूप में भी काफी मान्यता है।

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