Jun 05 2026 / 12:46 PM

आज है नवरात्रि का सातवां दिन, करें मां कालरात्रि की पूजा

आज नवरात्र का सातवां दिन है। इस दिन का पूजा में विशेष महत्व हैं नवरात्रि की सप्तमी तिथि को माता का कालरात्रि रूप का पूजन किया जाता है। इनका रूप अन्य रूपों से अत्यंत भयानक है, मार्कंडेय पुराण के अनुसार देवी के इस स्वरूप ने चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज सहित कई राक्षसों का वध किया है। देवी कालरात्रि को काली और चामुण्डा भी कहा जाता है। चण्ड और मुण्ड का वध करने के कारण देवी का नाम चामुंडा पड़ा। देवी दुर्गा के क्रोध से ही मां कालरात्रि प्रकट हुई हैं। जिनका स्वरूप भयंकर है।

कालरात्रि देवी का मंत्र-

एकवेणीजपाकर्णपुरानना खरास्थिता ।
लम्बोष्ठीकर्णिकाकर्णीतैलाभ्यङ्गशरीरिणी ॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा ।
वर्धनामूर्धजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी ॥

देवी कालरात्रि का स्वरूप-

मां दुर्गा के सातवें स्वरूप का नाम कालरात्रि है। इनका स्वरूप भयंकर और रोद्र रूप में है। इनकी भृकुटियां यानी भौंए तनी हुई हैं। इनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं। गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं। ये तीनों नेत्र गोल एवं रक्तवर्ण हैं। इनकी नाक से अग्रि की भयंकर ज्वालाएं निकलती रहती हैं। इनका वाहन गधा है। देवी कालरात्रि के हाथ में रक्त से भरा एक पात्र है। देवी का ये स्वरूप रक्तबीज के वध का प्रतिक है। क्योंकि रक्तबीज नाम के राक्षस को मारकर देवी कालरात्रि ने उसके रक्त को एक पात्र में इकट्ठा कर के पी लिया था।

पूजा का महत्व-

मां कालरात्रि की भक्ति से हर प्रकार का भय नष्ट होता है। जीवन की हर समस्या को पलभर में हल करने की शक्ति प्राप्त होती है। शत्रुओं का नाश करने वाली मां कालरात्रि अपने भक्तों को हर परिस्थिति में विजय दिलाती हैं। देवी कालरात्रि की पूजा करने से काम, क्रोध, मद और लोभ जैसे मानसिक दोष भी दूर हो जाते हैं। कालरात्रि देवी मन की गंदगी यानी बुरे विचारों से भी छुटकारा दिलवाती है। इनकी पूजा से पापों का नाश भी हो जाता है।

देवी कालरात्रि का माना गया है सातवां दिन-

शास्त्रों के अनुसार देवी कालरात्रि का स्वरूप अत्यंत भयंकर है। देवी कालरात्रि का यह भय उत्पन्न करने वाला स्वरूप केवल पापियों का नाश करने के लिए है। इनके मस्तक पर शिवजी की तरह तीसरा नेत्र है। तीसरा नेत्र हमारे अंतर्मन का प्रतीक है। इसका सीधा सा अर्थ है कि जब हम भक्ति के मार्ग पर चलते हुए ईश्वर के करीब पहुंच जाते हैं तो तीसरी आंख यानी अंतर्मन ही हमें सही रास्ता दिखाता है। जब किसी साधक के साथ ऐसी स्थिति हो जाए तो समझ लेना चाहिए कि वह भक्ति के अंतिम पड़ाव की ओर है, जहां से उसे सिद्धि प्राप्त हो सकती है।

पूजा-

मां कालराज्ञि की पूजा सुबह चार से 6 बजे तक करनी चाहिए। मां की पूजा के लिए लाल रंग के कपड़े पहनने चाहिए। मकर और कुंभ राशि के जातकों को कालरात्रि की पूजा जरूर करनी चाहिए। परेशानी में हों तो सात या सौ नींबू की माला देवी को चढ़ाएं। सप्तमी की रात्रि तिल या सरसों के तेल की अखंड ज्योत जलाएं। सिद्धकुंजिका स्तोत्र, अर्गला स्तोत्रम, काली चालीसा, काली पुराण का पाठ करना चाहिए। यथासंभव, इस रात्रि संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।

मां कालरात्रि की आरती-

कालरात्रि जय-जय-महाकाली।
काल के मुह से बचाने वाली॥

दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा।
महाचंडी तेरा अवतार॥

पृथ्वी और आकाश पे सारा।
महाकाली है तेरा पसारा॥

खडग खप्पर रखने वाली।
दुष्टों का लहू चखने वाली॥

कलकत्ता स्थान तुम्हारा।
सब जगह देखूं तेरा नजारा॥

सभी देवता सब नर-नारी।
गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥

रक्तदंता और अन्नपूर्णा।
कृपा करे तो कोई भी दु:ख ना॥

ना कोई चिंता रहे बीमारी।
ना कोई गम ना संकट भारी॥

उस पर कभी कष्ट ना आवें।
महाकाली माँ जिसे बचाबे॥

तू भी भक्त प्रेम से कह।
कालरात्रि माँ तेरी जय॥

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