समाधि की दिव्यतम स्थिति को प्राप्त महात्मा श्री सरस्वती नंदन स्वामीजी महाराज

(आलेख-निरंजन भारद्वाज): मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के थांदला के पद्मावती नदी के पावन तट पर स्थित एक दिव्य आश्रम,जिसकी पहचान ओर संबोधन वैकुंठ धाम,भजनाश्रम गुरुद्वारा के रूप में की जाती है,यही वह स्थान है,जो लगभग नौ दशक पूर्व पूज्य गुरुदेव भगवान् श्री सरस्वती नंदन स्वामी की साधना स्थली रहा है।इसी स्थान पर रहते हुए स्वामीजी महाराज द्वारा श्री रूक्मिणी वेंकट भगवान् की पूजा,आराधना करते हुए समाधि की दिव्य स्थिति की प्राप्ति की गई थी,ओर अपने जीवन काल में ही श्री सरस्वती नंदन स्वामीजी महाराज किंवदंती पुरुष बन गए थे।यह स्थान आज केवल झाबुआ जिला में ही नहीं,बल्कि प्रदेश सहित राजस्थान गुजरात एवं महाराष्ट्र में उनके अनुयायियों के लिए श्रद्धा का जीवंत केंद्र बन चुका है।थांदला नगर में स्थित इस अद्भुत गौरवशाली गुरुद्वारा में अपने स्वामी के चरणों में नतमस्तक होंने के लिए व्यास पूर्णिमा(गुरु पूर्णिमा) सहित महाराज श्री के जन्म महोत्सव पोष मास की पूर्णिमा के अवसर पर उक्त राज्यों से बड़ी संख्या में महाराजश्री के अनुयायी यहां आते हैं,ओर उनके प्रति अपने हृदय की सर्वोच्च श्रद्धा और भक्ति की अभिव्यक्ति करते हैं।महाराजश्री के जन्म महोत्सव पोष मास की पूर्णिमा पर वैकुंठ धाम गुरुद्वारा में करीब आठ दशक से जय जय सरस्वती नंदन स्वामी गुरूदेव का सात दिवसीय श्री गुरु नाम संकीर्तन महोत्सव आयोजित किया जाता है।सात दिवसीय महोत्सव के दौरान सम्पूर्ण नगर गुरु के दिव्य भावों की अनुभूति करता है,ओर पात्र साधकों को श्रीगुरू कृपा की साक्षात् अनुभूति भी प्राप्त हुआ करती है।श्री महाराजजी के अनुयायी,उनके कृपापात्र ओर अपने जीवन काल में उनका सान्निध्य प्राप्त कर चुके एक वयोवृद्ध गृहस्थ संन्यासी द्वारा करीब तीन दशक पूर्व एक समय बातचीत के दौरान महाराजजी द्वारा चमत्कृत कर देने वाले संस्मरणों का खुलासा किया गया था।उनके अनुसार श्री सरस्वती नंदन स्वामीजी महाराज द्वारा अपने शिष्यगणों को कई बार दिव्य अनुभूति कराई गई,वह सब कुछ एक चमत्कार ही होता था,किंतु महाराजजी उसके बारे में सदैव ही स्वयं को उन सब घटनाओं से अलग कर लिया करते थे, ओर तब उनका अक्सर यही कहना होता था कि इसमें मेरा कुछ भी नहीं बल्कि यह सब प्रभु कृपा प्रसाद है।कदाचित ऐसे चमत्कारों का श्रेय उनके द्वारा गौ माता को भी दिया जाता था।महाराज श्री,धर्म ग्रंथों के अध्येता ओर विवेचनाकार, एक संन्यासी,तपस्वी ओर उनके चरणों में अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति करते हुए प्रणाम करते हैं।
